तानसेन के शिष्य रहे हैं इनके पूर्वज,1800 से ज्यादा गाने दिए हैं फिल्म जगत को

The Fact India: जिनके (Dilip Sen) पूर्वज तानसेन के शिष्य रहे है ऐसे मशहूर संगीतकार दिलीप सेन, राजस्थान के सुजानगढ़ से ताल्लुक रखते है. दिलीप सेन और समीर सेन की जोड़ी बॉलीवुड के मशहूर संगीतकारों में गिनी जाती है.हालांकि अब ये अलग हो चुके हैं और अलग अलग तरीके से अपना काम कर रहे हैं. पर इनकी प्रसिद्धि कुछ कम नहीं हुई हैं. दी फैक्ट इंडिया ने दिलीप सेन से खास बातचीत की और उनके जीवन के कुछ यादगार पलों को जाना.

दिलीप सेन से की गई बातचीत के कुछ अंश-

सवाल- राजस्थान से मुंबई तक का सफर कैसा रहा?

जवाब-  हमारी (दिलीप सेन ) चार पुश्तें संगीतकार के तौर पर काम कर रही है. मेरे पिता जमाल सेन भी प्रसिद्ध संगीतकार थे. आजादी से पहले जमाल सेन कोलकाता गए थे जहां उन्होंने म्यूजिशिन और सिंगर के तौर पर रेडियो में काम करना शुरु किया वहां उन्होंने सबसे पहले कोलकाता रेडियो पर वंदे मातरम गाया. फिर अंग्रेजों के डर के कारण  वे लाहौर चले गए. वहां वे गुलाम हैरत साहब से मिले. हैरत साहब ने उन्हें संगीत में सहायक के रूप में रखा. मेरे पिता जमाल सेन ने ही ढ़ोलक और मटका फिल्मों में पहली बार बजाया. फिर 1935 वे मुंबई आए. उसके बाद शंभू सेन ने भी फिल्म जगत में बतौर संगीतकार कदम रखा.

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पहले मैं (Dilip Sen) मुंबई में बड़े भाई शंभू सेन के साथ बच्चों को राजस्थान राजघराने का डांस सिखाता था. फिर चाचा भतीजे की जोड़ी ने संगीतकार बनने की ओर कदम बढ़ाया. जो कि उस वक्त काफी मुश्किल था. मशहूर गीतकार असद भोपाली ने सूरमा भोपाली फिल्म में पहला मौका दिया.फिर साजिद नाडियावाला की फिल्म “जुर्म की हुकूमत” के मुहुर्त के लिए डायरेक्टर यश चोपड़ा को बुलाया गया. यश चोपड़ा ने जब गाना (महबूब मैं) सुना तो उन्होंने समीर सेन को “आईना” फिल्म के लिए ऑफर दिया. हमारे साथ रहे गुलशन कुमार. हमारे गाने में कोरस पार्ट हमे सबसे अलग बनाता था. यहां से दिलीप (Dilip Sen) और समीर सेन की जोड़ी की शुरुआत हुई और अबतक लगभग 1800 से ज्यादा गाने इंडस्ट्री को दिए.

सवाल- पहले के दौर में और अब में संगीत में कितना बदलाव आया है.

जवाब- 90 के दशक की बात करे तो संगीत के साथ साथ शब्द प्रधानता भी थी. पहले शब्द सुने जाते थे फिर संगीत चुना जाता था और लगभग 7-8 महीने बाद गाना बनकर तैयार होता था. यहां तक की डांस मास्टर की भी राय ली जाती थी. साल 2005 के बाद से म्यूजिक हो कास्टिंग हो या कई बार फिल्म की स्क्रिप्ट हो सब कुछ हीरो तय करता है.वही रीमेक फिल्मों में संगीत पहली फिल्म जैसा ही डब कर दिया जाता है. आज के म्यूजिक में शरीर तो है पर रुह नहीं है.

सवाल- क्या आज के संगीत को बनाने में मेहनत कम हो गई है?

जवाब –  कई गाने जैसे ‘अफलातून”, “ये खबर छपवा दो अखबार में” आदि में लाइव ऑर्केस्ट्रा इस्तेमाल किया जाता था. वही इलेक्ट्रोनिक मिडियम भी इस्तेमाल किए जाते थे. लेकिन वक्त के साथ समझ भी जरुरी है. पहले के गाने इसलिए हिट होते थे क्यूंकि वो सिचुएशन के हिसाब से बिठाए जाते थे. “ओले ओले” गाना से पहले उसकी जगह दूसरा गाना बनाया गाया था( बातचीत के दौरान किया गाने का जिक्र). सब रिजेक्ट करने के बाद ओले ओले सुनाया गया और यश चोपड़ा ने कहा “ तानसेन ये गाना इस साल का सबसे बड़ा हिट होगा.” जो की हुआ भी.

सवाल- कोई यादगार ऐसा पल जिसे आज तक नहीं भूले? 

जवाब- एक ख्वाहिश थी कि लता मंगेशकर के साथ एक फोटो हो या वो हमारा गाना गाए. यश चोपड़ा की आईना में ये ख्वाहिश पूरी हुई. लता मंगेशकर वहां एक गाना गाने आई थी और उस स्टूडियो में बैठकर एक ही म्यूजिक डायरेक्टर के और एक ही प्रोड्यूसर के उन्होंने चार गाने गाए जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. उन्हीं चार गानों में से एक गाना “होठों पे बस तेरा नाम है” सुनने के बाद उन्होंने वो गाना उसी वक्त गाने का फैसला लिया. यही वो यादगार पल था.

सवाल- क्या इस समय को आप पुराने दौर की तरह कोई यादगार गाना देना चाहेंगे?

जवाब- हमें फख्र है कि हम राजस्थान से है और आज हमारी चौथी पीढी भी सुपर हिट्स गाने दे रही है और अब हमारा पड़पोता भी इस लाइन में आ जल्दी आ जाएगा और हमारी पीढियां अब भी लगातार यादगार गाने जैसे “तूने मारी एंट्री” और “बाला” दे रही है.

पूरी कहानी सुनिए खुद दिलीप सेन की जुबानी-