Ganesh Chaturthi: बप्पा का धूमधाम से करें स्वागत, जानिए पूजा के समय किन बातों का रखना है ख्याल

The Fact India: भगवान गणेश को देवों में सबसे पहले पूजा जाता है. वैसे तो हर महीने की चतुर्थी गणेशजी को समर्पित है पर भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी कुछ खास होती है, क्यूंकि इस दिन गणेश जी का जन्म हुआ था. इस वर्ष 10 सितम्बर को यानि कल गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का यह पर्व मनाया जाएगा . हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार गणेश चतुर्थी से अगले 10 दिन तक  बाप्पा अपने भक्तों के बीच ही रहते है. इसके बाद विधि-विधान से विसर्जन किया जाता हैं.  

कोरोना के चलते इस साल भी गणेश चतुर्थी का आयोजन धूम-धाम से नहीं किया जायेगा. सार्वजनिक जगहों पर पंडाल लगा भक्तों की भीड़ नहीं जुटाई जाएगी. सरकार ने कोरोना की तीसरी लहर की चेतावनी देते हुए लोगों को अपने घरों में ही गणपति की पूजा करने की सलाह दी हैं और कोरोना गाइडलाइन की पालना करने के निर्देश दिए हैं.

ये है गणेश विसर्जन की पौराणिक कथा

धर्म शास्त्रों के मुताबिक महाभारत  ग्रंथ को लिखने का काम गणेश जी ने किया था. ये काम पूरे 10 दिन चला था. गणेश जी ने बिना रुके दिन-रात महाभारत लिखी थी. माना जाता है कि गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन महाभारत लिखने का काम पूरा हुआ था.  इसके बाद महर्षि वेद व्यास जी ने गणपति जी जो अपनी कुटिया में रखकर उनकी खूब सेवा की थी और साथ ही उनके मनपसंद व्यंजन बना कर खिलाये थे. गणेशजी के शरीर के बढ़ते तापमान को नियंत्रण में लाने के लिए वेद व्यास जी ने उन्हें सरोवर में डुबोया था. तभी से गणपति विसर्जन की प्रथा चली आ रही हैं.

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गणेश जी को घर में विराजमान करते समय इन चीजों का रखे ध्यान

बप्पा की पूजा के समय काले और नीले रंग के कपडे नहीं पहनने चाहिए. इस दिन लाल या फिर पीले कपडे पहनना शुभ होता है.

पूजा में कभी भी तुलसी का पत्ता ना चढ़ाए. पौराणिक कथाओं के अनुसार तुलसी ने गणेश जी को लंबोदर और जगमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था. जिससे नाराज बप्पा ने उन्हें श्राप दिया था.

हर साल गणपति की नयी मूर्ति की स्थापना करे, पुरानी मूर्ति का विसर्जन कर दे. कभी भी गणपति की दो मूर्ति साथ में ना रखे.

गणपति  की मूर्ति वहीं स्थापित करे जहां बिल्कुल भी अंधेरा ना हो. गणपति के दर्शन अंधेरे में करना अशुभ माना जाता हैं.

गणेशजी का आगमन शंख और घंटी बजाकर करे. इसके बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उन्हें विराजमान करे. इसके साथ ही दूर्वा और पान के पत्ते को गंगाजल में भिगोकर उन्हें स्नान कराये. फिर अपनी पूजा प्रारंभ करे.