एक और सांसद भड़के, बोले, “राज्य को फुटबॉल बना कर रख दिया है, हमें श्रमिक केन्द्रित राज्य बना दिया है”

ये सामान्य जानकारी है, पूरा परिचय हम बता देते हैं… सहरसा, बिहार से आने वाले मनोज कुमार झा जो राष्ट्रिय जनता दल के नेता हैं और राज्यसभा सांसद भी. बिहार में ही नहीं पूरे देश में काफी नाम है. ये दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत है. राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं, और विशेष ये भी कि 2018 में ये निर्विरोध चुने गए थे.

आज इनका जिक्र क्यों हो रहा है वो भी बता देते हैं. ये चर्चा में रहे थे 2021 में, अपने राज्यसभा भाषण के चलते. आज भी वैसा ही कुछ है. जहाँ मानसून सत्र में राजनेताओं के बयान, उनके भाषण और उनके क्रियाओं की विडियो वायरल हो रही है वैसे ही इनके भाषण की भी एक विडियो सामने आई है. नहीं – नहीं, ये बैंगन ले कर नहीं आए और ना ही इन्होने तख्तियां दिखाई, कुर्सियां भी नहीं चलाई और ना ही सदन को भंग करने का प्रयास किया, मनोज झा ने दिया भाषण, अपना समय मिलते ही बरस पड़े, अपने राज्य की समस्याओं के तीखे और स्पष्ट प्रहार किये.
बेबाकी से बोलने वाले प्रोफ़ेसर मनोज कुमार झा ने अपने राजनैतिक ज्ञान और अनुभव का पूरा इस्तेमाल करते हुए सदन में बिहार को ले कर अपना पक्ष रखा. उन्होंने खूब ट्वीट भी किये, और लिखा, “पूरे देश में सिर्फ और सिर्फ हताशा है. अलग-2 क्षेत्रों में रोज़गार के नाम पर अँधेरा, अभ्यर्थियों की COVID के कारण एक्स्ट्रा चांस की मांग पर नकारात्मक चुप्पी. रिक्तियों और भर्ती के नाम पर खुलेआम फर्जीवाडा है. संसद के सभी उपकरणों का प्रयोग इन युवाओं के लिए हो… बस यही ज़रूरत और ज़रूरी है”

मामले गंभीर थे और बहुत ही गंभीर तरीके से रखे भी गए सदन में. संसद में इनके व्यक्तव्य के समय जितनी चुप्पी थी उतनी आमतौर पर आपको देखने-सुनने को मिलेगी नहीं. सदन में उन्होंने भाषा पर भी नियंत्रण रखने की बात कही, उसी तीखे तेवर में झा ने कहा, “”मुफ़्त, free, freebies, मुफ्तखोर, रेवड़ी कल्चर… ये शब्दावली हमारे लोकतंत्र को, उसकी गरिमा को, उसके चरित्र को शर्मसार करती हैं!”
“अपने दायित्व को ख़ैरात का नाम ना दें। आप कुछ मुफ़्त नहीं दे रहे! ये जो अट्टालिकाएँ बन रही हैं उसमें गरीब का भी पैसा लगा है!”

अब अपने बयानों से झा ने नयी बहस को शुरू तो कर दिया है, साथ ही जो भी इस विडियो को देखता है आया इसमें कहे भाषण को कहीं पढ़ता है वो प्रतिक्रिया दिए बिना नहीं रहता.

अब जान लो झा ने बिहार के बारे में क्या कहा?
आप चुनाव जीतते हैं, जीतते रहिये, मैं ये भी कहूँगा कि आप दिल भी जीतिए. झा ने बहुत मार्मिक तरीके से अपनी बात रखते हुए एक चोकीदार की कहानी सुनाई, आप पढिये…

नैनसुख लाल अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता है सब सांसदों के घर की रखवाली करता है, 20000 की तख्वाह पाता है, 10 से 12000 पर वह साइन करता है मतलब मूल तख्वाह 10 से ₹12000 है. उसके दो बच्चे हैं. 4000 घर का किराया दे रहा है. 1200 रुपए सिलेंडर का हर महीने देता है. खाने पर 50 गुना 2 गुना 30, इसका हिसाब लगाइयेगा. स्कूल की फीस भी जो 2 बच्चे हैं उनकी, स्कूल आने जाने का खर्चा और आकस्मिक बीमारी नहीं जोड़ रहा, डीजल – पेट्रोल फिर नहीं जोड़ रहा क्योंकि उसके पास साइकिल है. यह नयनसुख दिल्ली में भी है, ये नयनसुख कोलकाता में भी है, मुंबई में भी है हमारे पटना में भी है .नयन सुख के नजरिए से महंगाई को देखिए और बेरोजगारी को देखिए तब पता चलेगा कि हमारे सरोकार कितने संकीर्ण है.

GST पर मनोज का कटाक्ष –
“पानी से लेकर कब्र तक कोई ऐसा मसला नहीं छोड़ा है जिस पर जीएसटी ना लगी हो कब्र में या दाह संस्कार की लकड़ी पर तो आदमी सुकून से जाए हम सब जानते हैं कफन में जेब नहीं होती है उसकी जेब पहले ही आपने ढीली कर दी मौत से पहले.
खजूर का पेड़ क्यों याद आया मनोज झा को?
मनोज बोले, “बड़ा भया तो क्या भया जैसे पेड़ खजूर, पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर… एक विशाल पार्टी, पूरे देश में सबसे विशाल पार्टी, एक विशाल राज्य में, एक विशाल बहुमत के लिए चुनाव लाई थी, विशाल पार्टी होने के साथ-साथ हृदय भी बड़ा होना चाहिए.

बिहार में बेरोजगारी को स्पष्ट कह डाला…
अग्नीपथ योजना पर भी कई बातें विरोध में कहीं, उन्होंने कहा, हमारे राज्य का बच्चा सरकारी नौकरी का सपना देखता है, रेलवे, सेना, शिक्षक… पर कहीं पर कुछ है ही नहीं. हमारे राज्य को विशेष दर्जा देने की बात कही गई हमारे राज्य को विशेष पैकेज देने की बात कही गई हमारे राज्य को फुटबॉल बनाकर कर दिया गया है उछाल के इधर उछाल के उधर हमको आपको श्रमिक केंद्रीत राज्य बना कर रख दिया है हम सिर्फ श्रम देते रहें और आप हमको जनशताब्दी जनसाधारण ट्रेन देते रहें ताकि हम अलग-अलग राज्यों में ट्रेन से अपने श्रमिक पहुंचा सकें यह सरासर नाइंसाफी है बिहार के साथ.”
मामले बड़े हैं, सपष्ट हैं, हल कितने मुश्किल हैं और कितना समय इन समस्याओं को ख़त्म करने में लगेगा, वो या तो राजनेता जानते हैं या इश्वर… उम्मीद इन समस्याओं से ज्यादा बड़ी आकार में दिखाई देती है, हर चुनाव में उम्मीद अपना आकार बढ़ा लेती है.
निराशा और उम्मीद कि लड़ाई अभी भी जारी है…

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